उत्तराखण्ड

Wildlife – हिमालयी इलाकों में भालुओं की बदलती आदतों से बढ़ी लोगों की चिंता

Wildlife- हिमालयी राज्यों में भालुओं के व्यवहार में आए बदलाव ने वन्यजीव विशेषज्ञों और स्थानीय प्रशासन का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हाल के अध्ययनों के अनुसार उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में भालू पहले की तुलना में अधिक संख्या में आबादी वाले इलाकों तक पहुंच रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता में कमी के कारण उनकी खान-पान की आदतें बदल रही हैं, जिसका असर उनके सामान्य जीवन चक्र पर भी दिखाई दे रहा है।

wildlife himalayan bear behavior change

शोध में सामने आए बदलाव

भारतीय वन्यजीव संस्थान और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि जंगलों में मिलने वाले पारंपरिक खाद्य स्रोत, जैसे बांज, काफल और हिंसालू, पहले की तुलना में कम उपलब्ध हो रहे हैं। शोध, जिसे Mammalian Biology Journal में प्रकाशित किया गया है, बताता है कि भोजन की इस कमी ने भालुओं को जंगल छोड़कर बागवानी क्षेत्रों और कृषि भूमि की ओर आकर्षित किया है।

फलों वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा रुझान

विशेषज्ञों के अनुसार अब सेब, खुबानी, अमरूद और पपीते जैसे फलों से भरपूर क्षेत्र भालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण बन गए हैं। हिमाचल प्रदेश के लाहौल, कुल्लू, किन्नौर, मंडी और सिरमौर सहित कई इलाकों में फलों के बागानों में उनकी मौजूदगी दर्ज की गई है। इसी तरह उत्तराखंड के उत्तरकाशी, मोरी, चकराता और आसपास के क्षेत्रों से भी भालुओं के बगीचों में पहुंचने और लोगों के संपर्क में आने की घटनाएं सामने आई हैं।

शीतनिद्रा के चक्र पर पड़ा असर

शोधकर्ताओं का कहना है कि फलों से मिलने वाली अधिक ऊर्जा ने भालुओं के प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित किया है। अध्ययन में 500 से अधिक भालुओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिसमें पता चला कि शीतनिद्रा से पहले उनकी कुल ऊर्जा का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा फलों से प्राप्त हो रहा है। अधिक ऊर्जा मिलने के कारण उनके शीतनिद्रा के पैटर्न में बदलाव देखा गया है, जिससे कई भालू पहले की तरह लंबे समय तक शीतनिद्रा में नहीं जा रहे हैं।

मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती

जीव विज्ञानियों का मानना है कि भालुओं के लगातार आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका बढ़ गई है। भोजन की तलाश में जब वन्यजीव गांवों और बागानों तक पहुंचते हैं, तब लोगों और जानवरों के आमने-सामने आने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। ऐसे मामलों में जान-माल का नुकसान होने का खतरा भी बना रहता है, इसलिए विशेषज्ञ स्थानीय लोगों को सतर्क रहने और वन विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन करने की सलाह दे रहे हैं।

संरक्षण और प्रबंधन पर बढ़ा जोर

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इस चुनौती का समाधान केवल भालुओं को आबादी वाले क्षेत्रों से दूर रखने तक सीमित नहीं है। जंगलों में प्राकृतिक खाद्य संसाधनों का संरक्षण, वन क्षेत्र की गुणवत्ता में सुधार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में प्रयास भी उतने ही आवश्यक हैं। उनका मानना है कि वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रभावी वन प्रबंधन के माध्यम से मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

Back to top button

Adblock Detected

Please remove AdBlocker first, and then watch everything easily.