RSSChief – मोहन भागवत बोले, संघ की कार्यपद्धति में विदेशों की भी बढ़ रही रुचि
RSSChief – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि संघ की कार्यशैली और व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया को लेकर अब विदेशों से भी उत्सुकता दिखाई दे रही है। उनका कहना था कि विभिन्न देशों से आने वाले लोग संघ के कार्यों का अध्ययन कर रहे हैं और यह जानना चाहते हैं कि युवाओं के विकास के लिए अपनाई जाने वाली इस पद्धति को अपने देशों में किस प्रकार लागू किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ से जुड़े स्वयंसेवक विभिन्न संस्थाओं में सक्रिय जरूर हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आरएसएस उन सभी संगठनों का संचालन करता है।

विशेष कार्यक्रम में रखा अपना दृष्टिकोण
मोहन भागवत ने यह बातें एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान कहीं, जहां डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार पर आधारित एक वीडियो का प्रसारण किया गया। इसी अवसर पर संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में पूर्णकालिक प्रचारकों के जीवन और कार्यों पर आधारित 100 वीडियो भी जारी किए गए। कार्यक्रम में उन्होंने संगठन के उद्देश्य और कार्यप्रणाली पर विस्तार से अपनी बात रखी।
व्यक्तित्व निर्माण को बताया प्राथमिक उद्देश्य
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि संघ का प्रमुख लक्ष्य ऐसे व्यक्तित्व तैयार करना है जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में जिम्मेदारी के साथ योगदान दे सकें। उनके अनुसार, संगठन केवल गतिविधियों के संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वयंसेवकों के जीवन में अनुशासन, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को विकसित करने पर भी समान रूप से ध्यान देता है। उन्होंने कहा कि इसी सोच ने देश और विदेश के अनेक लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।
विदेशी प्रतिनिधियों की रुचि का किया उल्लेख
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि अलग-अलग महाद्वीपों से आने वाले कई प्रतिनिधियों ने संघ के कार्यों को नजदीक से समझने की इच्छा जताई है। उनके अनुसार, कई आगंतुकों ने यह भी पूछा कि क्या युवाओं के प्रशिक्षण की इसी प्रकार की व्यवस्था उनके देशों में विकसित करने के लिए सहयोग मिल सकता है। उन्होंने इसे भारतीय कार्यपद्धति के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास का संकेत बताया।
संगठन को लेकर भ्रम पर दी सफाई
भागवत ने अपने संबोधन में उस धारणा पर भी प्रतिक्रिया दी जिसमें अक्सर कहा जाता है कि विभिन्न सामाजिक संगठनों में कार्यरत स्वयंसेवकों के कारण आरएसएस उन संस्थाओं का प्रत्यक्ष संचालन करता है। उन्होंने कहा कि यह धारणा वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाती। उनके अनुसार, अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य कर रहे स्वयंसेवक अपने-अपने संस्थानों की स्वतंत्र जिम्मेदारियों के अनुसार काम करते हैं और उन्हें किसी केंद्रीय स्तर से संचालित नहीं किया जाता।
राष्ट्र निर्माण और सामाजिक मूल्यों पर दिया जोर
उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य केवल स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक सोच और राष्ट्रहित की भावना को मजबूत करना भी है। उनके अनुसार, सामाजिक मूल्यों का पालन और सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण किसी भी राष्ट्र की मजबूती के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत यदि अपने मूल्यों के साथ आगे बढ़ेगा, तो वैश्विक स्तर पर उसकी भूमिका और प्रभाव भी मजबूत होगा।
समाज में बढ़ती स्वीकार्यता का किया उल्लेख
मोहन भागवत ने कहा कि समय के साथ संघ के कार्यों को लेकर समाज में स्वीकार्यता और विश्वास बढ़ा है। उनके अनुसार, संगठन के शुरुआती वर्षों में जिन चुनौतियों और उपेक्षा का सामना करना पड़ा था, अब परिस्थितियां पहले से अलग हैं। उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों की बढ़ती भागीदारी इस बदलाव का संकेत है और संगठन आगे भी सेवा तथा सामाजिक विकास से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता देता रहेगा।